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ग्रामीण भारत का अभिशाप rural india bane

Sep 27, 2019

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किसी भी देश की अर्थव्यवस्था आय, खपत, बचत और निवेश के बूते चलती है. जब आय का रास्ता खुलता है तो व्यक्ति खपत करता है. खपत के बाद जो बचत होती है, उसी को निवेश किया जाता है. लेकिन, मौजूदा आर्थिक आंकड़ों को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था इस चक्र के हिसाब से काम नहीं कर रही है।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था आय, खपत, बचत और निवेश के बूते चलती है. जब आय का रास्ता खुलता है तो व्यक्ति खपत करता है. खपत के बाद जो बचत होती है, उसी को निवेश किया जाता है. लेकिन, मौजूदा आर्थिक आंकड़ों को देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था इस चक्र के हिसाब से काम नहीं कर रही है।

आय सृजन के आंकड़ों पर गौर करें तो निश्चित ही पिछले 5 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय दर में वृद्धि हुई है. पर, यह औसत वृद्धि है जो एक गरीब को भी 79,882 रुपये प्रति वर्ष आय वाला बना देती है।

इस तरह आय सृजन का यह आंकड़ा वैधानिक प्रतीत नहीं होता है. इस आंकड़े को कृषि विकास दर के साथ चुनौती दी जा सकती है. कृषि विकास दर वर्तमान में 2.9 फीसदी पर आ चुकी है. जब देश की बुनियाद मानी जाने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही अपने सबसे न्यूनतम दर के साथ आगे बढ़ रही है तो फिर आय में वृद्धि का प्रश्न ही नहीं उठता।

खपत पर मार
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में दूसरा पहलू खपत है. 130 करोड़ से अधिक आबादी का देश होने की वजह से भारत को खपत आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है. लेकिन, वर्तमान आर्थिक आंकड़े खपत को लेकर भी चुनौती रख रहे हैं।

मोटर वाहनों की बिक्री के क्षेत्र में मौजूदा मोदी सरकार में वृद्धि दर 5.35 फीसदी प्रति वर्ष रही है. यह मनमोहन सरकार में 12.44 फीसदी प्रति वर्ष की दर से काफी कम है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 के आखिरी तीन महीनों में एफएमसीजी सेक्टर की वृद्धि दर 16 फीसदी थी. इस साल के पहले तीन महीनों में यह घटकर 13.6 फीसदी रह गई है।

ये आंकड़े साफ करते हैं कि लोग आय की कमी के कारण सिर्फ जरूरत की चीजों पर खर्च कर रहे हैं. इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ी है. खपत को बढ़ाने का दूसरा तरीका अर्थव्यवस्था में कर्ज का सृजन होता है. अभी खुदरा लोन की दर 19.42 फीसदी है. यह पहले की तुलना में काफी कम है. कर्ज की अनुपलब्धता ने भी खपत की दर में चपत लगाई है।

क्या है बचत का हाल
अर्थव्यवस्था में तीसरा पहलू बचत का होता है. 20 सालों में यह पहली बार है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में बचत की दर बढ़ने की जगह बचत में से ही खर्च देखा जा रहा है. जहां वर्ष 2011 में कुल बचत दर 9.9 फीसदी थी. वहीं, वर्ष 2018 में यह 6.6 फीसदी रह गई।

2017 में आम लोगों की कुल बचत दर जीडीपी के अनुपात में 17 फीसदी पर आ गई थी. यह पिछले 20 सालों में सबसे कम थी. इसका निष्कर्ष यह है कि आय सृजन और आय बढ़ोतरी न होने की वजह से लोग अपनी बचत से ही कटौती कर रोजमर्रा के काम कर रहे हैं।

निजी निवेश में गिरावट
अर्थव्यवस्था में चौथा पहलू निवेश का होता है. निजीकरण के दौर में निजी निवेश अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद का आधार बन चुका है. आंकड़ों के हिसाब से भारतीय अर्थव्यवस्था में निजी निवेश में गिरावट हो रही है. इसकी वजह से निजी क्षेत्र के रोजगार सृजन पर भी असर पड़ रहा है. वित्त वर्ष 2015 में निजी निवेश की दर 30.1 फीसदी हुआ करती थी. वित्त वर्ष 2019 में यह घटकर 28.9 फीसदी रह गई है. सरकार के आर्थिक रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो निजी और सरकारी निवेश पिछले 14 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया है।

आरबीआई के आंकड़ों में कहा गया है कि जीडीपी प्रतिशत मे मनरेगा को मिलने वाला बजट 2010-11 में 0.51 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 0.38 प्रतिशत रह गया है. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के मुताबिक रोजगार से जुड़े 40 फीसदी परिवार अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों से हैं।
ग्रामीण महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी भी मनरेगा का एक उजला पक्ष है. इस योजना के अंतर्गत समान काम के लिए समान मानदेय की व्यवस्था है. मनरेगा से आर्थिकी को एक लाभ ये भी बताया जाता है कि सौ रुपये का खर्च 400 रुपये के लाभ में तब्दील हो सकता है. लेकिन पिछले तीन चार वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों से मनरेगा के भुगतान में देरी या कटौती की खबरें भी मिली हैं, कहीं भ्रष्टाचार और दलालों का बोलबाला है तो कहीं 'काम नहीं है' कि तख्तियां लग चुकी हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में वित्त मंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के कई कदम उठाए हैं। ऑटोमोबाइल्स और हाउसिंग के लिए सेक्टोरल इंटरवेंशन से लेकर क्रेडिट एक्सेस तक बढ़ गया है। सरकार ने कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय की भी घोषणा की। कॉरपोरेट कर की दर भी कम हो गई है। उन कंपनियों के लिए, जो सभी छूटों से गुजरना चाहती हैं, यह 30% से घटाकर 22% कर दिया गया है, जो अधिभार और उपकर के साथ मिलकर 25.2% की प्रभावी दर की राशि होगी। नई कंपनियों के लिए, दर 15% रखी गई है।
बजट के दो महीने के भीतर कई कदम एक देर के सरकार के एहसास की ओर इशारा करते हैं कि अर्थव्यवस्था में सब ठीक नहीं है। चिंता की बात यह है कि इस मान्यता के बावजूद कि मंदी सोच से कहीं अधिक गंभीर है, सरकार के पास इसका कोई कारण नहीं है कि इसके कारण क्या हैं या क्या करने की आवश्यकता है।
अब यह स्थापित किया गया है कि मंदी आय में गिरावट के कारण मांग में गिरावट का परिणाम है। अधिकांश मैक्रो संकेतक, जिसमें मजदूरी और आय वृद्धि के अनुमान शामिल हैं, ने काफी समय तक यह सुझाव दिया है। यहां तक कि निजी क्षेत्र के आंकड़ों ने भी मांग संकट की ओर इशारा किया है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पतन से उपजी थी, जिसने हाल के वर्षों में आय और खपत में गिरावट के साथ सबसे अधिक संकट देखा है। लेकिन वित्त मंत्री द्वारा की गई कई घोषणाओं में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक भी कदम नहीं था। इसे एक प्रथागत उल्लेख भी नहीं मिला, जैसे कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आर्थिक मंदी में कोई भूमिका नहीं थी, या अगर ऐसा किया भी गया था, तो यह एक पुनरुत्थान में मदद करने के लिए पर्याप्त महत्वपूर्ण नहीं था।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति उदासीनता अज्ञानता के कारण नहीं है। बल्कि, यह एक बड़ी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के ढांचे का हिस्सा है जो कि 1991 की आर्थिक सुधारों के बाद लगातार सरकारों ने किया है। चूंकि यह राजनीतिक लामबंदी के लिए महत्वपूर्ण है, सरकारें केवल चुनावों से पहले इसे याद करने के लिए लोन वेवर्स, कैश ट्रांसफर या बढ़ी हुई सब्सिडी के माध्यम से मतदाताओं को संरक्षण देती हैं। इनपुट और आउटपुट कीमतों, बाजार संरचनाओं, क्रेडिट तक पहुंच और सरकार से समर्थन के अन्य उपायों में असंतुलन की जांच और सही करने का प्रयास शायद ही हुआ है, जिनमें से अधिकांश समान नीति और आर्थिक संरचनाओं में फंस गए हैं जो 1980 के दशक में प्रबल हुए थे। हालांकि, पिछले तीन दशकों में कृषि की प्रकृति और ग्रामीण गैर-कृषि अर्थव्यवस्था में नाटकीय रूप से बदलाव आया है। जबकि इनने गतिशीलता को दिखाया है, विमुद्रीकरण और व्यापक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण के जटिल मामले हैं।
"सुधार" आधारित राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रभुत्व का मतलब है कि विकास को बढ़ावा देने के किसी भी प्रयास का उद्देश्य कॉर्पोरेट भारत और मध्यम वर्ग को खुश करना है। नतीजतन, सरकार के "सुधार" मित्रता को स्थापित करने का एकमात्र मीट्रिक प्रभाव है। यह कॉर्पोरेट मुनाफे पर है, नवीनतम प्रोत्साहन शो के एपिसोड के रूप में है।

इसके पहले भी केंद्रीय बजट 2019-20 में फिर से मोदी सरकार ने प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं को नज़रअंदाज़ किया है। यही स्थिति पिछली मोदी सरकार में भी थी। इस तरह की योजनाओं की क्षमता बढ़ाने की भारी मांग के बावजूद सरकार की ऐसी उदासीनता से ग़रीब वर्गों की उम्मीदों को झटका लगा है।
पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, मनरेगा 2005 के अनुसार) के तहत काम की मांग बढ़ी है। उदाहरण के लिए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2018-19 के दौरान ग्रामीण भारत के लगभग 9.11 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत काम के लिए आवेदन किया था। हालांकि सरकार लगभग 7.77 करोड़ के लिए अस्थायी काम दे सकी जिसका मतलब है कि लगभग 1.34 करोड़ (यानी 15%) लोगों को इस योजना के तहत रोज़गार नहीं मिल सका। इन सबके बावजूद अधिकारियों(योजना को लागू करने वाले) का तर्क है कि वे फ़ंड की कमी के कारण मांग को पूरा नहीं कर सके। और फिर भी वर्तमान बजट यह नहीं दर्शाता है कि सरकार ने इस पर कोई ध्यान दिया है। चिंता की बात ये है कि मनरेगा के लिए 2018-19 (संशोधित अनुमान) के दौरान 61,084 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे जबकि 2019-20(बजट अनुमान) में यह राशि कम होकर 60,000 करोड़ रुपये हो गई है।
कुल सरकारी ख़र्च में हिस्सेदारी के रूप में मनरेगा में आवंटन 2014-15 में 1.98% से बढ़कर 2016-17 में 2.44% हो गया था लेकिन 2018-19 में कम हो कर 2.49%हो गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस वित्त वर्ष यानी 2018-19 में घटकर 2.15% रह गया है। आंकडे़ को नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है। इसी प्रकार चार्ट अन्य योजनाओं जैसे एकीकृत बाल विकास योजना (आसीडीएस), मिड-डे-मील, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के प्रति सरकार की उदासीनता को भी दर्शाता है।

मिड-डे-मील (एमडीएम) योजना
वर्ष 2001 में शुरू की गई मिड-डे-मील योजना का उद्देश्य देश भर के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन प्रदान करना है। लेकिन मोदी सरकार में इस योजना प्राथमिकता नहीं मिली है। कुल ख़र्च में एमडीएम की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2014-15 में 0.63% से घटकर वित्त वर्ष 2019-20 में 0.39% (आवंटित 11,000 करोड़ रुपये) हो गई है। दूसरी तरफ़ करोड़ों वंचित बच्चे कोई लाभ नहीं उठा सके। उदाहरण के लिए केवल बिहार में कुल 1,80,95,158 छात्रों (कक्षा1-8) का उन स्कूलों में दाख़िला है ये योजना लागू है। इनमें से लगभग 41% या 73 लाख छात्रों को बिहार में इस योजना के तहत लाभ नहीं मिल पाया।
समेकित बाल विकास सेवा योजना
समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) योजना के तहत आंगनवाड़ी सेवाओं, नेशनल न्यूट्रिशन मिशन, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, किशोरियों के लिए योजना,नेशनल क्रेच योजना, बाल संरक्षण सेवाएं और बच्चों के विकास और संरक्षण के लिए योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा लागू की जाती है। जबकि सरकार ने वित्त वर्ष2018-19 (20,951 करोड़ रुपये) में हुए ख़र्च की तुलना में 2,283 करोड़ रुपये अधिक आवंटित किया लेकिन कुल ख़र्च की तुलना में आईसीडीएस योजना की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। यह एक ऐसा पैटर्न है जो मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद से पनपा है। इसे ऊपर की चार्ट में दर्शाया गया है।
नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम
कई राज्य सरकारों द्वारा नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम (एनएसएपी) योजना के कार्यान्वयन के लिए अधिक राशि की मांग के बावजूद इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इस योजना में वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (आईजीएनओएपीएस), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना(आईजीएनडब्ल्यूपीएस), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विकलांगता पेंशन योजना (आईजीएनडीपीएस), राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना (एनएफ़बीएस) और अन्नपूर्णा शामिल हैं। इस वर्ष सरकार ने इस योजना के लिए केवल 9,200 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं जो पिछले वर्ष की तुलना में सिर्फ़ 300 करोड़ रुपये अधिक है। लेकिन कुल व्यय के मुक़ाबले इस स्कीम का हिस्सा 2014-15 में 0.43% से घटकर 2019-20 में 0.33% हो गया है।
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा, "एससी, एसटी और अन्य सामाजिक समूहों के लिए प्रमुख योजनाएं और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम(एनएसएपी) के तहत पेंशन के लिए मनरेगा जैसी प्रमुख योजना में घटाया गया आवंटन चिंता की बात है।" उन्होंने कहा कि ये बजट आवंटन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के संबोधन को प्रतिबिंबित नहीं करता है जिन्होंने कहा था कि बजट का केंद्र बिन्दु सरकार के मध्य से दीर्घकालिक विज़न तक है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विकास व कल्याण के लिए प्रमुख योजनाएं
इस बजट में सरकारी योजनाओं के तहत लाभ प्राप्त करने के लिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की स्थिति में परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है। योजनाओं की प्रभावहीनता या ख़राब क्रियान्वयन अक्सर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की चिंता का विषय रहा है। हालांकि इन वर्गों के लोगों के प्रति सरकार की लापरवाही अभी भी बरक़रार है। ऐसे में इनकी स्थिति और भी बदतर हो सकती है जैसा कि इस बजट के ख़र्चों में कल्याणकारी योजनाओं की हिस्सेदारी के विश्लेषण से पता चलता है।
अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए इस प्रमुख कार्यक्रम में शिक्षा छात्रवृत्ति, विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों के विकास, वनबंधु कल्याण योजना,आदिवासी अनुसंधान संस्थानों को सहायता, आदिवासी उप-योजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता और संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत अनुदान शामिल है। कुल व्यय के मुक़ाबले इस श्रेणी का हिस्सा मोदी सरकार में 0.23% से 0.25% के बीच ही रहा है।
इसी तरह अनुसूचित जाति वर्ग के विकास के लिए प्रमुख कार्यक्रम में शिक्षा से संबंधित छात्रवृत्ति, एससी उप-योजना, नागरिक अधिकारों को सशक्त करने, आजीविका को बेहतर करने और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए योजनाएं शामिल हैं। अनुसूचित जाति के प्रति सरकार की उदासीनता आगे दिए गए आंकड़ों से सामने आती है। 2018-19 में इस प्रमुख योजना के तहत 7,609 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए (जो 2018-19 के संशोधित अनुमान के अनुसार कुल व्यय का 0.31% है), जबकि इस वर्ष आवंटित राशि केवल 5,444.5 करोड़ रुपये तक हो गई है जो 2019-20 में आवंटित कुल व्यय का केवल 0.2% है।
यह विडंबना है कि ऐसे समय में भी जब ग्रामीण क्षेत्रों में आय में कमी और खपत में कमी आई है, तो प्रतिक्रिया ग्रामीण संकट को दूर करने के बजाय कंपनियों की सहायता करना है। इनमें से किसी भी कदम का कुल मांग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इनसे भी राजकोषीय तनाव में योगदान की संभावना है। हालाँकि, समय की आवश्यकता को सरकारी खर्च में वृद्धि के माध्यम से मांग को पुनर्जीवित करना है। मांग में निरंतर वृद्धि की अनुपस्थिति में, कर विराम का लाभ केवल अस्थायी होगा। मजबूत मांग के बिना, कर सस्ता निवेश में वृद्धि की संभावना नहीं है।
इससे सरकार के नीतिगत ढांचे पर भी एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। यह विश्वास करना मुश्किल है कि सरकार मंदी या उसके विस्तार के कारणों से अवगत नहीं है। हालाँकि, यह एक नीतिगत ढाँचे में काम करता रहता है जो अर्थव्यवस्था की परेशानियों की विरल समझ को दर्शाता है। पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के विपरीत, जिसे अपने दूसरे कार्यकाल में नीतिगत पक्षाघात की विशेषता थी, यह सरकार कुछ नीतिगत निर्वात में काम कर रही है। यह हर बीमारी के लिए एक ही नुस्खा है प्रतीत होता है। एक क्षणिक उत्तेजक की तरह, यह एक रिकवरी का भ्रम दे सकता है, लेकिन यह केवल बीमारी के उपचार में देरी करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था इस मोड़ पर बर्दाश्त नहीं कर सकती।


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