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Electronic intelligence satellite

Apr 10, 2019

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Electronic intelligence satellite
इसरो ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV C-45 के ज़रिये इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस उपग्रह एमीसैट को सफलतापूर्वक लॉन्‍च किया। एमीसैट के सफल प्रक्षेपण से इंटेलिजेंस के क्षेत्र में देश को बेहद मज़बूती मिलेगी। इसके साथ ही इसरो ने पहली बार तीन अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रहों को स्थापित किया।
इसरो ने एमीसैट समेत 29 उपग्रहों का एक साथ सफल प्रक्षेपण किया जिसमें 28 विदेशी उपग्रह शामिल हैं।
एमीसैट के ज़रिये सीमा पर दुश्मन की छोटी-छोटी हरकतों पर भी नज़र रखी जा सकती है।
पहली बार इसरो ने एक ही मिशन के दौरान तीन अलग-अलग कक्षाओं में सैटेलाइट स्थापित करने की उपलब्धि हासिल की।
हाल ही में भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक नया इतिहास रचा था जब भारत ने स्पेस में एक मूविंग सैटेलाइट को मारने का सफल परीक्षण किया था। भारत उस समय ऐसा करने वाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा देश बना था।
इसरो का इस साल के अंत तक 30 मिशनों के प्रक्षेपण का कार्यक्रम है।
पीएसएलवी-सी 45
राकेट PSLV-C45 ने 436 किग्रा. का एमीसैट उपग्रह और लिथुआनिया, स्पेन, स्विटज़रलैंड तथा अमेरिका के 28 उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित किया।
विदेशी उपग्रहों में 24 उपग्रह अमेरिका के, 2 लिथुआनिया और एक-एक स्विटज़रलैंड और स्पेन के हैं।
इसरो प्रमुख के. सिवन और अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिकों ने 17 मिनट की उड़ान के बाद 749 किमी. दूर स्थित कक्षा में एमीसैट उपग्रह के प्रवेश करने पर खुशी जताई।
वहीं 220 किग्रा. के सभी 28 विदेशी उपग्रहों को करीब 504 किमी. दूर कक्षा में स्थापित किया गया।
भारत के लिये यह मिशन इसलिये भी बेहद खास है क्योंकि इसरो का यह पहला ऐसा मिशन है जिसमें 3 अलग-अलग कक्षाओं में सैटेलाइट स्थापित किये गए।
चार स्टेज में 16 पैनल स्थापित करने वाला भी यह पहला मिशन है। इस मिशन में जिन सैटेलाइट को लॉन्च किया गया उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है एमीसैट यानी इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सैटेलाइट। यह DRDO के रक्षा अनुसंधान में मदद करेगा।
एमीसैट उपग्रह का खास मकसद विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम को मापना है। इस सेटेलाइट मिशन पर इसरो और DRDO ने संयुक्त रूप से काम किया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का यह पहला ऐसा मिशन है जिसे आम लोगों की मौजूदगी में लॉन्च किया गया।
इस मिशन के लिये चार स्टेप ऑन मोटर से लैस PSLV QL संस्करण का उपयोग किया गया।
पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी PSLV का उपयोग भारत के दो प्रमुख मिशनों में किया जा चुका है।
2008 में चंद्रयान में और 2013 में मंगल मिशन में PSLV का ही इस्तेमाल किया गया था।
एमीसैट की प्रमुख विशेषताएँ
इसरो के इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके तहत पहली बार पृथ्वी की तीन कक्षाओं में उपग्रह और पेलोड को भी स्थापित किया गया जिनकी मदद से इसरो अंतरिक्ष संबंधी प्रयोग करेगा।
एमीसैट का प्रक्षेपण रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (DRDO) के लिये किया गया है जो दुश्मन पर नज़र रखने के लिहाज़ से बेहद महत्त्वपूर्ण है।
इसका मकसद विद्युत चुंबकीय माप लेना भी है। इस सैटेलाइट से सुरक्षा एजेंसियों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी क्षेत्र में कितने मोबाइल फोन और अन्य संचार उपकरण सक्रिय हैं।
एमीसैट के ज़रिये दुश्मन देशों के रडार सिस्टम पर नज़र रखने के साथ ही उनकी लोकेशन को भी आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।
इस सैटेलाइट की मदद से सीमा पर इलेक्ट्रॉनिक या किसी भी तरह की मानवीय गतिविधि पर आसानी से नज़र रखी जा सकती है।
एमीसैट की एक और खासियत यह है कि यह दुश्मन के इलाकों का सही इलेक्ट्रॉनिक नक्शा बनाने हेतु सटीक जानकारी देगा।
इसका कुल वज़न 436 किलोग्राम है जिसे 748 किलोमीटर की ऊँचाई वाली कक्षा में स्थापित किया गया। यह उपग्रह DRDO के रक्षा शोध में काफी मदद पहुँचाएगा।
इसरो के लॉन्च व्हीकल PSLV की विशेषताएँ
अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपित करने के लिये PSLV इसरो का सबसे खास वाहन है। यह भारत द्वारा विकसित तीसरी पीढ़ी का लॉन्चिंग व्हीकल है। यह भारत का पहला लॉन्च व्हीकल है जिसमें लिक्विड स्टेज यानी लिक्विड राकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया है।
1994 में पहली बार इसको सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। तबसे यह भारत का विश्वसनीय और बहुमुखी वर्क हार्स व्हीकल के तौर पर उभरा है।
इसकी ऊँचाई 44 मीटर होती है। व्यास 2.8 मीटर और चरणों की संख्या 4 है।
PSLV को तीन प्रकार से विकसित किया गया है, ये हैं- PSLV-G, PSLV-CA तथा PSLV एक्सल।
PSLV की मदद से मुख्य रूप से ऐसे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा जाता है जिनकी मदद से धरती की निगरानी की जा सके या तस्वीर ली जा सके। ऐसे सैटेलाइट को रिमोट सेटिंग सैटेलाइट कहा जाता है।
PSLV आमतौर पर अंतरिक्ष के सनसिंक्रोनस सर्कुलर पोलर आर्बिट यानी SSPO में सैटेलाइट भेजता है।
SSPO 600 से 900 किमी. की ऊँचाई पर स्थित होता है। यह आमतौर पर लगभग 1000 ग्राम तक के सैटेलाइट को SSPO में भेजता है।
PSLV चार चरणों वाला लॉन्च व्हीकल है। इसकी पहली और तीसरी स्टेज में सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल होता है। वहीं दूसरी और तीसरी स्टेज में लिक्विड राकेट इंजन का इस्तेमाल होता है।
सबसे पहले स्ट्रैपऑन मोटर का इस्तेमाल करते हैं। PSLV-G और PSLV एक्सेल के राकेटों में पहले चरण के दौरान तीव्रता से आगे बढ़ाने के लिये 6 ठोस राकेट स्ट्रेप ऑन मोटरों का प्रयोग किया जाता है।
स्टेप ऑन मोटर की मदद से रॉकेट को ऊँचाई तक ले जाने में मदद मिलती है।
पहले चरण में PSLV के 6 ठोस स्टेप ऑन बूस्टरों द्वारा संवर्द्धित S-139 ठोस राकेट मोटर का उपयोग किया जाता है।
दूसरे चरण में तरल नोदन प्रणाली द्वारा विकसित रॉकेट इंजन लगा होता है जिसे विकास इंजन के नाम से भी जाना जाता है।
PSLV के तीसरे चरण में ठोस रॉकेट मोटर का प्रयोग होता है जो लॉन्च के दौरान वायुमंडलीय चरण के पश्चात् तेज़ धक्के के साथ ऊपरी हिस्से को आगे धकेलता है।
चौथा चरण PS-4 है, इसमें दो तरल इंजनों का प्रयोग किया जाता है।
GSLV
PSLV की तरह GSLV यानी जियो सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल भी इसरो द्वारा ही विकसित है। GSLV एक सफल लॉन्च व्हीकल है जो चौथी पीढ़ी का लॉन्च व्हीकल है।
अपनी जियो सिंक्रोनस नेचर के चलते सैटेलाइट अपने आर्बिट में एक निश्चित अवस्था में घूमता है और यह धरती से एक निश्चित स्थान पर दिखाई देता है।
PSLV और GSLV भारतीय वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ हैं जिनकी सफलता ने भारत का परचम दुनिया और अंतरिक्ष में लहरा दिया है।
अंतरिक्ष में भारत का सफर
हमारे देश में अंतरिक्ष अनुसंधान गतिविधियों की शुरुआत 1960 के दौरान हुई। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई ने देश के सक्षम और उत्कृष्ट वैज्ञानिकों, मानव विज्ञानियों, विचारकों और समाज विज्ञानियों को मिलाकर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व करने के लिये एक दल गठित किया और यहीं से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का सफर शुरू हो गया।
भारत ने केरल के मछुआरों के एक अनजान सा गाँव थुम्बा में 21 नवंबर, 1963 को अपना पहला साउंडिंग राकेट लॉन्च किया।
राकेट को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिये साइकिल का इस्तेमाल किया गया था।
1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की नींव रखी गई। 1972 में अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग का गठन किया गया जिसने अंतरिक्ष की शोध गतिविधियों को मज़बूती प्रदान की।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में 70 का दशक प्रयोगात्मक युग साबित हुआ। इस दौरान आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी और एपल जैसे प्रयोगात्मक उपग्रह कार्यक्रम चलाए गए।
अंतरिक्ष के क्षेत्र में 19 अप्रैल, 1975 के दिन भारत ने पहली बार बड़ा कदम उठाया। इस दिन इसरो ने देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट लॉन्च किया।
इस प्रायोगिक उपग्रह का वज़न 360 किग्रा. था। आर्यभट्ट का यह नाम प्राचीन भारत के जाने-माने खगोलविद् के नाम पर पड़ा।
10 अगस्त, 1979 को उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-3 लॉन्चर का प्रयोगात्मक तौर पर परीक्षण किया गया।
18 जुलाई, 1980 को भारत ने अपने पहले स्वदेशी प्रक्षेपण यान SLV-3 से रोहिणी RS-1 सैटेलाइट को लॉन्च किया।
18 जुलाई, 1980 को इसरो ने भारत के पहले स्वदेशी प्रक्षेपण यान SLV-3 से रोहिणी RS-1 सेटेलाइट को लॉन्च किया।
दूरसंचार उपग्रह इनसैट का विकास इसरो का अलग पड़ाव था।
30 अगस्त, 1983 को इनसैट 1-B उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया गया। इसके साथ इनसैट उपग्रहों की सीरीज़ की शुरुआत हो गई।
1984 तक इनसैट तकनीक से दूरसंचार, टेलीविज़न जैसी सुविधाएँ जुड़ गईं।
1984 में राकेश शर्मा अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने। इसरो ने 17 मार्च, 1988 को भारत की पहली रिमोट सेंसिंग तकनीक वाला सैटेलाइट IRS-1A लॉन्च किया।
10 जुलाई, 1992 को पहले उपग्रह इनसैट-2A को अंतरिक्ष में भेजा गया। 23 जुलाई,1993 को इनसैट-2B का सफल प्रक्षेपण किया गया।
12 सितंबर, 2002 को अंतरिक्ष में जाने वाली देश की पहली महिला कल्पना चावला के नाम पर कल्पना-1 सैटेलाइट लॉन्च किया गया।
20 सितंबर, 2004 को पूरी तरह से शिक्षा पर आधारित एडुसैट जीसैट-3 का प्रक्षेपण किया गया।
22 दिसंबर, 2005 को डायरेक्ट टू होम यानी DTH केबल टीवी नेटवर्क के लिये इनसैट 4-A उपग्रह लॉन्च किया गया।
22 अक्तूबर, 2008 को चंद्रयान-1 के सफल प्रक्षेपण के साथ ही इसरो के ऐतिहासिक चंद्र मिशन की शुरुआत हुई। इसे PSLV-CII के ज़रिये अंतरिक्ष में भेजा गया।
1 जुलाई, 2013 को इसरो को एक और बड़ी सफलता मिली जब उसने भारत का नेविगेशन उपग्रह IRNSS-1A प्रक्षेपित किया।
इसके साथ ही भारत ने अमेरिका की तर्ज़ पर अपना GPS सिस्टम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
2014 में इसरो ने सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजा। 67 किमी. का सफर तय कर पहली बार में ही मंगलयान सीधे उपग्रह की कक्षा में पहुँच गया।
इसरो ने अप्रैल 2018 में नेवीगेशन सिस्टम नाविक के आखिरी और आठवें उपग्रह IRNSS-II का सफल प्रक्षेपण किया।
निष्कर्ष
अंतरिक्ष में PSLV के ज़रिये उपग्रह भेजने की तकनीक में भारत को महारथ हासिल है। दुनिया भर के देश भारत के PSLV और GSLV पर भरोसा करते हैं। इसरो की ग्राहक सूची में अमेरिका, यू.के., कनाडा, जर्मनी, कोरिया गणराज्य और सिंगापुर सहित कुल 28 देश शामिल हैं। अभी तक देश और विदेश के लिये इसरो ने कुल 48 PSLV सफलतापूर्वक भेजे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अंतरिक्ष की दुनिया में नए लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा है
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